Wednesday, July 18, 2007

तुम होती तो कुछ ऐसा होता ??????




एक दिन जब सवेरे सवेरे, सुर्मायी से अंधेर कि चादर हटा के
एक पर्बत के तकिये से, सूरज ने सर जो उठाया, टोह देखा
दिल कि वादी में चाहत का मौसम है
और यादों कि डालियों पर
अनगिनत बीते लम्हों कि कलियाँ महेकने लगी हैं
अनकही अनसुनी आरजू, आधी सोयी हवी आधी जागी हवी
आंखें मलते हुवे देखती है, लहेर दर लहेर
मौज दर मौज, बहती हवी जिन्दगी
जैसे हर एक पल नयी है, और फिर भी वही, हाँ, वही जिन्दगी
जिसके दामन में एक मोहब्बत भी है, कोई हसरत भी है
पास आना भी है, दूर जान भी है, और ये एहसास है
वक़्त झरने सा बहता हुवा, जा रह है, ये कहता हुवा
दिल कि वादी में चाहत का मौसम है
और यादों कि डालियों पर
अनगिनत बीते लम्हों कि कलियाँ महेकने लगी हैं...........
महकने लगी है .................